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माँ नर्मदा जयंती की महा आरती के दौरान बोले महंत ह्र्दयगिरी : सर्व तीर्थ नायक है माँ नर्मदा।

पेशवा घाट पर भव्य नर्मदा जयंती महोत्सव में बनारस की तर्ज पर हुई नर्मदा महाआरती

महेश्वर। मप्र:- वैदिक काल से पावन नगरी के रूप में माँ नर्मदा नदी के किनारे स्थित महेश्वर नगरी में नर्मदा जयंती का एक दिवसीय भव्य आयोजन सम्पन्न हुआ। प्रातः बेला में पूज्य साध्वी महंत जगतगिरी गुरु माँ एवं महंत ह्र्दयगिरी महाराज के सान्निध्य में सुविख्यात प्राचीन पेशवा घाट पर इक्यावन युगल जोड़ी द्वारा सवा दो सौ किलो दूध एवं पंचामृत से आचार्य विद्वानों के मंत्रोच्चारण में माँ नर्मदा का महाभिषेक किया गया। सवा क्विंटल कढाई हलवे का भोग लगा कर माँ नर्मदा को चुनरी चढाई गई। इस अवसर पर पाँच सौ एक कन्याओं का पूजन किया गया।


       शाम के मुख्य कार्यक्रमों में पूज्य साध्वी महंत जगतगिरी गुरु माँ एवं महंत ह्र्दयगिरी जी के पावन सान्निध्य, अतिथिद्वय श्री तिलकसिंह डीआईजी पुलिस खरगोन, विक्रम सेन अध्यक्ष भारतीय पत्रकार संघ ‘एआइजे’, कथा वाचक संत श्यामदास महाराज, योगेश शर्मा प्रांत सेवा प्रमुख, विक्की शर्मा भारतीय पत्रकार संघ युवा प्रदेश अध्यक्ष, राजेन्द्र राजपूत प्रदेश पदाधिकारी’ किसान मोर्चा रहे। इस अवसर पर शाम को अमेरिका से आयी सुश्री उमा फड़के ने शास्त्रीय संगीत की प्रस्तुति दी। स्वर सम्राज्ञी स्व. लता मंगेशकर को श्रद्धांजलि देते हुए निर्गुणी भजन की प्रस्तुति दी। पूना से आए अनूप कुलथे ने वायलिन पर मन मोह लिया।


       महेश्वर नगर के राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त श्याम रंजनसेन गुप्ता के नृत्यांजलि संस्था की पलक उपाध्याय, सलोनी दुबे, वैष्णवी सोनेर, गोरी अत्रे, अमीषा गुप्ता, शीतल श्रवनेकर, प्रज्ञा चौहान द्वारा नर्मदा अष्टक एवं शिव तांडव की नृत्यमय प्रस्तुति दी।अतिथियों द्वारा दीपदान किया गया। दीपदान समिति ने पाँच हजार एक दिप जलाकर छोड़े गए। माँ नर्मदा की काकड़ आरती हुई जिसमें बड़ी संख्या में भक्तों ने भाग लिया। प्रसाद के साथ पूजित रुद्राक्ष भी वितरण किए गए। इस अवसर पर हजारों जन उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन राष्ट्रीय कवि ‘नरेंद्र अटल’ ने किया एवं आभार पंडित मधु चौरे द्वारा किया गया।

माँ नर्मदा की मान्यता

नर्मदा नदी बड़ी ही मान्यताओं वाली नदियों में शामिल है। बड़े बड़े विद्वान ऋषि मुनि मां नर्मदा की परिक्रमा के दौरान यात्रा पूरी कर चुके हैं। क्षेत्रवासियों को पीने के लिए शुद्ध जल 12 माह उपलब्ध रहता है। यहां तक कि बड़े-बड़े डेम्प बनाकर नर्मदा नदी के पानी को रोक कर नहरों के जरिये खेतो तक पहुचाया जा रहा है।

नर्मदा – मध्यभारत की जीवनरेखा

नर्मदा भारत में पाँचवीं सबसे बड़ी नदी है। यह 1312 कि.मी. की कुल लम्बाई के साथ, प्रायद्वीपीय भारत की अधिकांश नदियों की दिशा के विपरीत पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है। नर्मदा-कछार एक संकरा तथा लम्बा कछार है, जिसका कारण नर्मदा-घाटी का भौमिकी विज्ञान की दृष्टि से एक भ्रंश घाटी होना है। नर्मदा-कछार का विस्तार नर्मदा के उत्तर की तुलना में दक्षिण में अधिक है।

माँ नर्मदा का धार्मिक परिचय

भारत में नदियों को जीवनदायिनी माँ के रूप में पूजा जाता है। नर्मदा सबसे महत्त्वपूर्ण पवित्र नदियों में से एक है और नर्मदा में भी अपार आस्था समाई हुई है। पवित्रता में इसका स्थान गंगा के तुरन्त बाद है। कहा तो यह जाता है कि गंगा में स्नान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है वह नर्मदा के दर्शन मात्र से ही प्राप्त हो जाता है। इसे ‘मइया’ और ‘देवी’ होने का गौरव प्राप्त है। पुरातन काल से ऋषि-मुनियों की तपस्या स्थली रही नर्मदा आज भी धार्मिक अनुष्ठानों का गढ़ है। पूरे देश में यही एक मात्र ऐसी नदी है जिसकी परिक्रमा की जाती है। मन में अपार श्रद्धा लिये हुए सैकड़ों साधु और तीर्थयात्री पैरों के छालों की परवाह किये बगैर 2600 कि.मी. की यात्रा में 3 वर्ष 3 महीने और 13 दिन में पूरी करके अपने जीवन को धन्य मानते हैं। सामान्यतः नर्मदा-परिक्रमा गुजरात के भरूच के अरब सागर से प्रारम्भ होती है और मध्य प्रदेश के मैकल पर्वत स्थित नर्मदा उद्गम अमरकंटक से होकर वापस नदी के विपरीत किनारे से पुनः भरूच पर सम्पन्न होती है।

नर्मदा के किनारे सैकड़ों तीर्थस्थल और मन्दिर तो हैं ही साथ ही अनेक स्थानों पर इसका सौन्दर्य देखते ही बनता है। असंख्य जड़ी-बूटियों और वृक्षों के बीच से बहती हुई नर्मदा को मध्य प्रदेश की जीवनरेखा भी कहा जाता है। सैकड़ों छोटी-मोटी नदियों को अपने में समेटती हुई यह नदी कभी इठलाती हुई चलती है, कभी शान्त बहती है तो कभी सहस्त्र धाराओं में विभाजित हो जाती है। मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर के पास संगमरमरी दूधिया चट्टानों को चीरकर इसको बहता देख दर्शक को अलौकिक सुख की प्राप्ति होती है। नर्मदा के निर्मल जल में स्नान से जो सुख प्राप्त होता है वह अवर्णनीय है। यह अपने तट पर आये आगन्तुकों को आराम देती है इसी से इसका नाम ‘नर्मदा’ पड़ा है और चुलबुली-शरारती भी है और इसी कारण इसे ‘रेवा’ भी कहा गया है। स्कंद पुराण में इस नदी का वर्णन रेवा खण्ड के अन्तर्गत किया गया है। कालिदास के ‘मेघदूतम’ में नर्मदा को रेवा का सम्बोधन मिला है, जिसका अर्थ है पहाड़ी चट्टानों से कूदने वाली।

पवित्र नदी नर्मदा के तट पर अनेक तीर्थ हैं, जहाँ श्रद्धालुओं का ताँता लगा रहता है। इनमें कपिलधारा, शुक्लतीर्थ, मांधाता, भेड़ाघाट, बरमान, शूलपाणि, महेश्वर, भड़ौंच उल्लेखनीय हैं। विशेष रूप से ओंमकारेश्वर शहर जो बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है नर्मदा नदी के मार्ग में आने वाले महत्त्वपूर्ण तीर्थ स्थलों में से एक है। नर्मदा नाम भगवान शिव के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। पुराणों में नर्मदा को शंकर जी की पुत्री कहा गया है, इसका प्रत्येक कंकर को शंकर माना जाता है। नर्मदा में पाये जाने वाले स्वाभाविक रूप से गठित चिकने पत्थर, जिन्हें बनास कहा जाता है तथा जो एक तरह का क्वार्ट्ज होता है, उन्हें शिवलिंगों के रूप में जाना जाता है। दुर्लभ और अद्वितीय चिह्नों से युक्त शिवलिंगों को बहुत ही शुभ माना जाता है। राजराजा चोल द्वारा तंजावुर, तमिलनाडु में निर्मित बृहदीश्वर मन्दिर में स्थित शिवलिंग सबसे बड़े बाना शिवलिंगों में से एक है। ऐसा भी माना जाता है कि आदि-शंकराचार्य ने नर्मदा नदी के तट पर ही अपने गुरू गोविन्द भागवतपद से मुलाकात की थी।

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